पितृ-दोष : लोगों को बरगलाने का एक आसान तरीका

कण्ठावरोधरोमाञ्चाश्रुभि: पस्परं लपमाना: पावयन्ति कुलानि पृथिवीं च ॥ ६८ ॥
भावार्थ - ऐसे अनन्य भक्त कण्ठावरोध, 'रोमांच और अश्रुयुक्त नेत्रवाले होकर परस्पर सम्भाषण करते हुए अपने कुलों को और पृथ्वी को पवित्र करते हैं।तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि, सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि, सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि ॥ ६८ ॥
भावार्थ - ऐसे भक्त तीर्थों को सुतीर्थ, कर्मों को सुकर्म और शास्त्रों का सत-शास्त्र कर देते हैं।
तन्मयाः ।। ७० ।।
भावार्थ - (क्योंकि) वे तन्मय हैं।
मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवताः सनाथा चेयं भूर्भवति ॥69॥
भावार्थ - (ऐसे भक्तों का आविर्भाव देखकर) पित्तरगण प्रमुदित होते हैं, देवता नाचने लगते हैं और यह पृथ्वी सनाथा हो जाती है।ऊपर के श्लोक पढकर ये बात साफ हो जाता है कि पित्तरगण अपने परिजनों को देखकर आनन्दित होते हैं न कि उनसे रूष्ट होकर उन्हे परेशान करते हैं। अगर आप खुश हैं तो वो खुश होते हैं, अगर आप दु:खी हैं तो वो दु:खी होते हैं। इसलिए आप सभी से मैं यही कहना चाहूँगा कि इन तथाकथित ज्योतिषियों के बहकावे में न आएं और हमेशा अच्छे कर्म और भगवद भक्ति करते रहें। इससे आपके पित्तर हमेशा आपसे प्रसन्न रहेंगे।